दलित साहित्य में स्वानुभूति को व्यक्त करने पर अधिक बल दिया गया है। हिन्दी साहित्य में अन्य विधाओं के साथ – साथ कहानियाँ भी विशेष दस्तावेज के रूप में सामने आती दिखाई देती है। यह कहानियाँ घडाई नहीं है। बल्की इन्हे दलितों के सामाजिक जीवन से उठाई गई है। दलित सामाजिक जीवन को वाणी देते हुए हरपाल सिंह कहते है की “सामाजिक यथार्थ को ध्वनित करने वाली कहानियाँ ही दलित साहित्य में ऊर्जा की सार्थक तरंगे उठा सकी है। यह निर्विवाद सत्य है की भारतीय समाज जातीय दृष्टि से विभाजित समाज है”।१इसी विभाजन ने मनुष्य की विवेक शक्ति तथा समानता को नष्ट कर दिया है। अपने देश में सामाजिक भेदभाव में उच्च समझनेवाले वर्ग ने सामाजिक जीवन में हीनता बोध पैदा करके तमाम ऐसे कार्य किया हैं जिससे दलित समाज का जीवन निकृष्टतम होता गया।
भारतीय समाज में दलित वर्ग के लिए किसी रूप में दो बातें सदा जूड़ी है। वह है शोषण और अपमाण। फिर चाहे वह दलित समाज का व्यक्ति शिक्षित हो या अशिक्षित अपमान होना निश्चित है। इससे भी भयानक स्थिति यह है की अपनी स्वार्थ पूर्ति होने तक हिन्दू समाज इस दलित समाज को अपने ही समाज का एक हिस्सा समजता है और बातों में इन्हे पूसलाने का काम भी करता है । परंतु काम पूरा होते ही वह तुरंत अपना रंग बदल लेता है और उन्हे दूर करता है। ‘रूप नारायण सोनकर की कहानी ‘सद्गती’ में इस सवर्ण मानसिकता का पर्दापाश हुआ है’।
भूमंडलिकरण के इस दौर में समानता और मानव अधिकार की बात चल रही है। ऐसे में जाति प्रथा का अस्तित्व जारी रहना वाकई शर्मनाक है। समानता के प्रति आज के परिप्रेक्ष्य में चिंता एवं चिंतन दोनों का विषय बना हुआ है। अच्छे एवं स्वस्थ समाज के लिए समानता की अति आवश्यक्ता है। ऐसी स्थिति में साहित्य के माध्यम से आंतरिक अनुभूति व्यक्त होना स्वाभाविक है। इस तरह की स्थिति पर डा. पशुपतिनाथ लिखते है “दलित साहित्य का स्वरूप एक क्रांतिकारी परिर्वतन एवं मौलिक समानता का संघर्ष बनता जा रहा है। यह संघर्ष आज का नहीं बल्कि जब से पिछडे दलित है तब से उनकी समस्या पर विचार का क्रम चल रहा है। फिर भी सवर्ण मानसिकता बदली हुई दिखाई नहीं देती ।अनपड़ तो अनपड़ पढे़ लिखे लोग भी इनसे अपमान जनक बाते बोलने में पिछे नही हटते। शिक्षा के प्रचार और प्रसार के साथ दलितों ने अपनी प्रगति करना शुरू किया उतना ही उनका विरोध भी शुरू हुआ”२। इस तरह की अपमान जनक स्थिति का चित्रण चंद्रभान यादव की कहानी ‘गाम्धी जयंती’ में हुई है। किसी भी महान पुरूष की जयंती या पुण्यतिथि को मनाने का मुख्य हेतु यह होता है की उनके कार्य, त्याग बलिदान, साथ हि उनके चिंतन एवं दर्शन को याद करके उस राह पर चलनेकी कोशिश करना । ऐसी बातों पर भाषण देना आसान है परंतु उस पर अमल करना बहुत कठिन है।
समाज में निरंतर परिर्वन होता रहता है। इसके साथ सामाजिक संबंधों में भी परिवर्तन होना स्वाभाविक है। इस गतिशिल सामाजिक परिवर्तन की एक छाप हमें साहित्य में देखने को मिलती है। विश्व में मानवतावादीयों ने धर्म तथा रूढ़ियों और परंपराओं को त्यागते हुए सभी मानवों को एकता के सुत्र में बांधकर संपूर्ण मानव को ही अपना केंद्र घोषित किया है। साथ ही अमानवीयता का घोर विरोध करते हुए उन्होने नवीन विचार धारा को जन्म दिया है। परंतु भारत जैसे देश में परंपरावादी दृष्टिकोन रखने वाली समाज के मन पर उसका असर अभी पूरी तरह से नहीं हुआ है। गौर से देखा जाय तो परंपरावादी विचारों को बढ़ावा देने का काम कही – कही दलित समाज भी करता है। परंतु इसके पीछे उनकी कुछ एक मजबुरियाँ भी हुआ करती है। जैसे आर्थिक कमजोरी और अशिक्षा भी एक है। सरकार की तरफ से जो सुविधा मिलती है उसका पूरा लाभ यह समाज उठा नहीं पाता है। कारण इनमें एकता की कमी है। वर्तमान समय में भले ही दलितों में कुछ संघटनाएँ बनी हैं परंतु उन्हे भी तोड़ने की कोशिश सवर्ण समाज करता आया है। इतना ही नहीं वह उसमें सफल भी होता है। क्योंकि उनके हतकंडे उतने मजबूत है। धर्मेंद्र कुमार की कहानी ‘मुखिया’ में उर्पयुक्त विचार धारा की सत्यता पाई जाती है। कहानी में दलित चमारों के जीवन गाथा का चित्रण काफी मर्म स्पर्शी हुआ है। इनके जीवन की वास्तविकता को दर्शाते हुये कहानीकार ने एक जगह कहा है “नीच जातियों में एकता का अभाव होता है। क्योंकि वह अशिक्षित होते हैं। बडे लोगों की चालों को समझ नहीं पाते है। जिनके पास हजारों रोटींयाँ है, वह एक रोटी खाने का गम नहीं करेंगा, किंतु एक रोटी वाला व्यक्ति जान पर खेल जाय तो कोई आश्यर्य नहीं। सदा की भाँती यहाँ भी उच्च जाति ने निम्न जाति को विखंडित करने में पूर्ण महारत हासिल की थी”।३ दलितों की स्थिति का यह सच्चा चित्र है जो देश के किसी भी कोने में बसे दलित पर लागू होती है।
हिन्दी के साहित्यकार और चिंतक सामाजिक समस्याओं के प्रति सदैव जागरूक रहें है। दलित जीवन संबंधी अधिकांश कहानियाँ किसी न किसी समस्या को लेकर ही लिखी गई है। वास्तव में इन समस्याओं का मूल कारण यही हो सकता हैं की दलितों के विकास के प्रति सर्वण समाज की उदासीनता और सवर्ण के साथ बराबरी की तिरस्कार की भावना। जयप्रकाश कर्दम की कहानी ‘मोहरे’ उपर्युक्त बातों के लिए खरी उतरती है। कहानी में बच्चों का भविष्य बनाने के लिए पूरे मनोयोग और निष्ठा के साथ अपनी सेवा निभाने वाले प्रामाणिक अध्यापक सत्यप्रकाश के स्थानांतरण के लिए सवर्ण अध्यापक रामनरेश त्रिपाठी तथा अन्य अध्यापकों ने जो रास्ता अमनाया वह शिक्षकी पेशा के लिए एक दाग है।
हिन्दी साहित्य के अंतर्गत दलित जीवन संबंधी जो कहानियाँ लिखी गई, और लिखी जा रही हैं उनमें अधिक तर जोर सामाजिक व्यवस्था की वास्तविकता को दर्शाना रहा है। वर्तमान समाज में जो भी अपमान भरा असंतोष जनक वातावरण भरा है उसे दर्शाने में वर्तमान कहानियाँ कटीबध्द है। इस संसार में मनुष्य जब जन्म लेता है तब वह मनुष्य का ही एक लघु रूप होता है । परंतु हिन्दु समाज में बनी जाति-धर्म की विचारधारा या मान्यताओं के अनुसार उसका रूप बदलने में देर नहीं लग जाती। बहुत कम समय में वह किसी जाति या धर्म का हो जाता है। और इसी के साथ समाज में उसके उच्च -निच्च होने का स्थान भी तय हो जाता है। इसी विचार या परंपरा के चलते भविष्य में भी उसके कर्म श्रेष्ठ होने पर भी जाति के आधार पर शोषण किया जाता है। मोहनदास नैमिशराय की कहानी ‘दर्द’ इसी परंपरागत विचारधारा का रेखांकन करती है। कहानी में स्वतः लेखक ने एक जगह पर कहा है “जो समाज में नियम था वही सरकार में भी था”।४ कहानी में हरभजन एक राज्य सरकारी की नोकरी करता है । वह उसे विरासत में मिली थी । उनके पिता भी वही काम करते थे। उनकी मृतु एक दुर्घटना में हुई थी । तो हरभजन को चपरासी के बदले चपरासीगरी ही मिली । उस समय उनकी शिक्षा मैट्रिक थी। परंतु उनको वह नियम बताया गया और पदोन्नती का आश्वासन दिया गया। काम पर हाजिर हुए पहले दिन ही कार्यालय के बड़े बाबू से तिरस्कार भरी बात सूनने को मिली थी। उनका कहना था “चपरासी के बेटे होकर चपरासी नहीं बनोगे तो क्या लाट साहब बनोगे?”५ इस तरह की शुरवात हुई उस नौकरी का अंत भी सुखात्मक नही हुआ। जब हरभजन ने अपनी पदोन्नती के लिए कोशिश की तब उसे मुख्यालय से सफलता मिलती है । लेकिन बडे बाबू शर्मा उसके रास्ते का कांटा बन जाते है। उसके पदोन्नती के पत्र को उन्होने रोख रखा था। पूछताछ के समय बड़े बाबू शर्मा उनके सारे वजूद को हिलाकर रख देते है। इससे पता चलता है की जाति के सवाल कितने निर्मम होते है। “बडे बाबू शर्मा कहते है हरभजन मेरे जीते जी तू इस ऑफिस में बाबू नहीं बन सकता। चपरासगीरी कर और अपने बच्चों को पाल”।६ उनकी दर्द भरी बाते सुनकर हरभजन हताश हो जाता है। उनके मन में रह- रह कर यही सवाल आता है की ‘उसके पिता चपरासी, वह चपरासी, क्या उनका बेटा भी चपरासी ही बनेगा? इसी सोच के कारण हरभजन के सीने में तेज दर्द उठता है। यह दर्द उनके शरीर को हमेशा के लिए ठंडा कर देता है। उच्चता के उन्माद में भरे सवर्ण अधिकारी की बाते एक व्यक्ति के जीवन कोही पूरी तरह से खत्म कर देती है।
२१वीं सदी के प्रथम दशक की कहानियों में सामाजिक समानता एवं मानवीय संवेदना का चित्रण हैं। जिस में सामाजिक अंर्तविरोधों की तिव्र समझ, पारंपारिक आस्थाओं एवं अंधविश्वासों का विखंडन संप्रदाय की घृणित अभिव्यक्ति मानवता शून्य समाज की कटू आलोचना तथा दलित वर्ग के प्रति सहानुभूति, शोषकों के प्रति तिव्र आक्रोश सामाजिक यथार्थ में मानवता की और सामाजिक परिवर्तन आदि की माँग है।
इस दशक की कहानिकारों ने सामाजिक विषमताओं, विसंगतियों एवं विद्रुपताओं को अपनी कहानी का कथ्य बनाया है। उच्चता के उन्माद में घिरे हुए सवर्ण व्यक्ति की अमानवियता का चित्रण ‘डंक’ कहानी में रत्न कुमार सांभरिया ने प्रस्तुत किया है। “मनु की उक्ति है, शूद्र का धन संचय ब्राह्मण को पिड़ा पहुचाता है”।७ प्रस्तुत कहानी में यह उक्ति गाँव के कुटिल बाह्मण सतना के दिमाग को टटोलकर जागृत करती है। वास्तव में सतना दरिद्र ब्राह्मण था। अपनी बेटी का विवाह करने योग्य परिस्थिति भी उसकी नहीं थी। ऐसे में धनवान दलित खरे उसे पैसे की मदद करता है। परंतु सतना इस एहसान को बहुत जल्दी भूल जाता है। साथ पैसे लौटाने के बदले दलित खेरा को पिटवाकर कमर तोड देता है।
अपने देश में दलित जन जाति पर अत्याचार और अन्याय की एक लंबी दास्तान पाई जाती है। देश तो आझाद हुआ, परंतु कुछ एक अपवादों को छोडकर आज भी परंपरावादी उच्चता का उन्माद भरनेवाले सवर्ण जनों के चंगुल से पिछड़ी दलित जन-जातियों को आझादी नहीं मिली है। आज भी कुछ एक मामलों में अपना वर्चस्व बनाने की भरपूर कोशिश करते हैं। भारत रत्न डा. बाबासाहेब अंबेडकर के प्रयत्न स्वरूप प्रशासनिक बल मिला है। साथ ही शिक्षा के कारण दलितों में काफी मात्रा में परिवर्तन आ गया है। इस परिवर्तन के साथ वर्तमान में सवर्ण समाज के युवा भी जुड़ गए हैं। वह अपने आप में परिवर्तन करके दलितों के साथ, हाथ मिलाने के साथ- साथ घनिष्ठ मित्र भी बने हुए है। परंतु कुछ पुरान पंथी अभी भी अपनी घिसी-पीठी परंपरा से बाज नहीं आए हैं। ओमप्रकाश वाल्मीकि जी की कहानी ‘ब्रह्मास्त्र’ में उपर्युक्त विचार धारा की सत्यता प्रकट हुई है । राज वाल्मीकि की कहानी ‘इस समय में’ भी दलित समस्या की वास्तविकता पर विचार किया गया है। वैसे तो यह कहानी अपने आप में बहुत विषयों को एक साथ लेकर चलती है। जिसमें नव युवा पीढ़ि का देखने का अपना एक तर्जुबा अलग है। इन सारे विषयों के बावजूद जाति पर आधारित जो चर्चा या चित्रण कहानी के माध्यम से हुआ है वह वास्तविकता का दर्शन कराता है। हिंदू समाज में जाति का बटवारा काम के आधार पर हुआ था। परंतु आधुनिक काल में दलितों के कर्म बदल जाने पर भी उन्हे परंपरागत रूढ़िवादी विचारधारा के आधार पर उन्हे आज भी लज्जित किया जाता है। वास्तव में स्कूल के शिक्षकों की एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है की विद्यार्थियों में जाति या उच्च –निच्च की भावना या विचार को स्थान न दे। परंतु कभी-कभी जाने- अनजाने में ही सही जिस बात को नहीं बताना चाहिए, उसी बात को शिक्षकों के द्वारा बताया जाता है। इसका बाल मन पर कितना गहरा असर होता है यह बताना बहुत कठिन होता है। यही संदेश ‘इस समय में’ कहानी देती है।
दलितों पर होनेवाले अन्याय को दर्शानेवाली डा. पूरन सिंह की कहानी ‘अंर्तकलह’ भी एक है। प्रस्तुत कहानी में अप्रैल १४ के दिन डा. बाबासाहेब के जन्म दिवस के अवसर पर दलितों में जो उत्साह और उमंग भरी होती है वह किसी त्यौहार से कम नहीं है। परंतु यह उत्साह सवर्ण समाज को देखा नहीं जाता। इस में बाधा डालने का काम किया जाता है। प्रस्तुत कहानी में इसका सजिव वर्णन हुआ है।
“मेरे विचारानुसार दलितों का यही एक त्यौहार होना चाहिए। अन्य त्यौहारों के नाम पर पैसा और समय बर्बाद करने के बजाय दलितों के मसिहा डा. बाबासाहेब के जन्म दिवस के अलावा पवित्र त्यौहार कौन सा हो सकता है?”।
आलोक कुमार सातपु्ते की कहानी ‘साहब की जात’ में परंपरागत विचार धारा वाले सवर्ण समाज का दर्शन होता है। गरीब हरिजन मन्नू चमार का बेटा सुखीराम डिप्टी कलेक्टर बन जाता है। इसी खुसी में सारा मुहल्ला भी खुशी में झूमने लगता है। खुशी में घर-घर में चिराग की थालीयाँ सजाई गई थी । चारों ओर त्यौहार का – सा वातावरण था। चमार मन्नू घर के आंगन में लेटकर अपने गरीबी में बिते दिनों को याद कर रहा था। “उसके बाबूजी ने कितने कष्ट सहकर उसे पढ़ाया लिखाया। अब घर के सारे दलिद्दर दूर हो जायेंगे”।८ दूसरी तरफ ब्राह्मण पारा में इसी बात को लेकर मातमी माहौल बना हुआ था। विशेष कर ब्राम्हण पारा के गजेंद्र महाराज के घर पर। गजेंद्र महाराज उस गाँव के मुखिया थे। हरिजन बस्ति के आनंदी मौहोल को देखकर वह बात- बात पर बिगड रहे थे। सामाजिक बांधव्य के आधार पर जिस गाँव गजेंद्र में रहते थे उसी गाँव का पिछडे वर्ग का एक दलित युवा कलेक्टर बनना तो पूरे गाँव के लिए गर्व की बात थी। इस का गर्व सिर्फ हरिजन बस्ती को न होकर संपूर्ण गाँव को होना था। लेकिन यह संभव नहीं था। क्योंकि गाँव एक होने पर भी वहाँ रहने वाले जाति समुदाय अलग –अलग थे। ऐसे में जहाँ सवर्ण का वर्चस्व हो वहा पर दलित युवा का कलेक्टर बनना खुशी की जगह ईर्श्या और द्वेष की भावना का होना स्वाभाविक ही था।
दलितों के विकास में बाधा उत्पन्न करने की मानसिकता सवर्ण समाज ने अपने पीढ़ि दर पीढ़ि को जैसे विरासत में सौंप दिया है। एक तरफ विद्या पाकर दलित युवा अपना विकास कर लेना चाहता है तो दुसरी तरफ उन्हे आगे न आने देने की भरपूर कोशीश सवर्ण युवा करता है। इसका जीवंत दस्तावेज है श्याम नारायण कुदंन की कहानी ‘छात्रावास’। अपने विश्वविद्यालयिन जीवन में उनके साथ घटीत नारकीय यातना का चित्रण उन्होने इस कहानी में प्रस्तुत किया है। दलित विद्यार्थियों का शोषण करने सवर्ण जाति के विद्यार्थी छात्रावास में किस प्रकार अपनी-अपनी लाबी बनाकर रहते हैं इसका विस्तृत चित्रण इस कहानी में हुआ है।
जब कोई समाज किसी एक वर्ग का विरोध करता है तब विरोध होने वाले मनुष्य का आचरण दो तरह का हो सकता है। पहला अन्यायी शक्तियों का दृढ़तापूर्वक सामना करके उनके विरोध का दमन कर दे। और दूसरा वह अपनी अस्मिता तथा योग्यता को भूलकर अन्याय एवं दुराचारी के सामने घुटने टेक दे। इस में पहला आचरण विद्रोही है और दुसरा शक्ति और आत्मविश्वास के अभाव का सूचक । दलित समाज सदैव अपनी मान मर्यादा या प्रतिष्ठा और मानवीय अधिकारों से वंचित रहा है। बाकी कारण और भी कई होगें लेकिन इसका मूल कारण हिन्दू समाज की जाति व्यवस्था ही है। इसी व्यवस्था के कारण दलित समाज आजीवन गुलामी व बदसलूकी को सहता आ रहा है। भारतीय हिन्दू समाज की बनाई जाति व्यवस्था जहाँ अधिक लचिली दिखाई देती है । वही वह लोहे की जंजीर से भी अधिक मजबूत साबित हुई है।
इस सदी के प्रथम दशक में हिन्दी साहित्य के अंतर्गत बहुत सी कहानियाँ हैं जो दलित समाज के जीवन को दर्शाती है। सामान्यतः हर समाज और काल में कुछ सामाजिक विषमताएँ हमेशा से नजर आती है। इस में दलितों के सेवा भाव को धर्म सन्मान माना और उन्हे हमेशा से नीचे ही रहने की व्यवस्था उच्च समाज करता आया है। जहाँ भी दलितों ने उपर उठने की कोशीश की वहाँ उसे शक्ति और युक्ति दोनों के प्रयोग से दबाया गया। समाज के विकास के लिए सहानुभूति, श्रम और स्वतंत्रता इन्ह तीन्हो की आवश्यता है। परंतु कुछ एक अपवादों को छोडकर धर्म के नाम पर हिन्दू समाज ने एक बडे श्रम करने वाले वर्ग के साथ निर्दयता से व्यवहार करके अपनी कमजोरी का ही परिचय दिया है।
हिन्दी कहानियों में दलित जीवन संबंधी जो विचार व्यक्त हुए है वह मनोरंजनात्मक न होकर उस समाज का लेखा-जोखा और भोगा हुआ यथार्थ है।
संदर्भ
१.हरपाल सिंह: - ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानियों में सामाजिक लोकतांत्रिक चेतना.
२. डा. पशुपति उपाध्याय:- समकालिन हिन्दी आलोचना दशा और दिशा.
३. धर्मेंद्र कुमार:- मुखिया.
४. मोहनदास नैमिशराय: दर्द
५. –वही—
६. –वही—
७. रत्नकुमार सांभरिया: डंक
८. आलोक कुमार सातपुते: साहब की जात.
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